Thursday, February 14, 2008

प्रयोजनम्

प्रयोजनमनुद्दिश्य मन्दोऽपि न प्रवर्तते ।
अतस्तमधुना वच्मि सन्त: शृण्वन्तु यत्नत: ॥
प्रवृत्तिरेषा भूतानां हिताय प्रशमाय मे ।
अन्तस्थाया: सरस्वत्या: प्रवाह: प्रसरेदिति॥

2 comments:

दिवाकर मणि said...

"ब्लॉगस्पॉट"इति स्थाने भवतः वृत्तपत्रं मत्सदृश अल्पज्ञानां कृते प्रेरकं भविष्यति इति आशास्महे.

चरैवेतु, चरैवेतु..............

शुभाकांक्षी
मणिदिवाकरः

ममता त्रिपाठी said...

सर और कुछ लिखिये खोजते हुए आपका ब्लाग मिल गया मुझे पर हमें बहुत अल्प सामग्री मिली जितना सोंचा था उतनी नही मिली और चाहिए।